तुम

Haven’t written in Hindi for over twenty years now.. yet it came easily today..

तुम्हें ढूँढ रही हूँ शायद

इस अंजान शेहर में

इन अंजानी चेहरों में

तुम, जो मेरी आँखों में देखके

बात को समझ जाओ

तुम, जो चल सको मेरे साथ

थोड़ी सी जो बची है

उस राह पे

जहां हम न समझ पाए

कि तुम कहाँ शुरू होते हो

और मैं कहाँ खतम..

चलो चलते हैं कुछ दूर

कुछ बातें कर लेते हैं

कुछ तुम कहो कुछ अपनी मैं सुनाऊँ

इसी बहाने रूह चल लेंगे

शायद, हाथों में हाथ थामे

अगर मैं फिसल जाऊँ

तुम संभाल लेना

जब तुम भूल जाओगे

तो हक़ीकत मैं याद दिलाऊँगी

चलो चलते हैं कुछ दूर

कुछ पल ख़ैरियत में ही सही

जहां हम न समझ पाए

कि तुम कहाँ शुरू होते हो

और मैं कहाँ खतम..

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